चीन के खिलाफ क्‍या फेल हो जाएगा क्‍वाड? जानें क्‍यों दोराहे पर चल रहा है ‘एशियाई नाटो’

टोक्‍यो: ‘चीन सो रहा है, उसे सोने दो। जब वह उठेगा, दुनिया को हिलाकर रख देगा।’ फ्रांस के पहले शासक नेपोलियन बोनापार्ट का 18वीं सदी में दिया गया यह बयान 21वीं सदी में सच साबित हो रहा है। पूर्वी चीन सागर से लेकर भारत के लद्दाख तक जंगी तैयारी में जुटे चीनी ड्रैगन ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों को धमकाना तेज कर दिया है। चीनी नौसेना जहां ताइवान के पास व्‍यापक युद्धाभ्‍यास कर रही है, वहीं तिब्‍बत के पठारों में भी पीएलए की तोपें गरज रही हैं। महासंकट की इस घड़ी में चीनी ड्रैगन पर लगाम कसने के लिए अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्‍ट्रेलिया के नेतृत्‍व में बना ‘क्‍वाड’ अभी दोराहे पर चल रहा है और उसे सूझ नहीं रहा है कि किस राह पर बढ़ना है। क्‍वाड देश अब जापान में शिखर बैठक कर रहे हैं जिस पर चीन आगबबूला है और कहा इसका ‘विफल’ होना तय है। आइए समझते हैं क्‍या क्‍वाड चीन के सामने फेल तो नहीं हो जाएगा ?

क्‍वाड देशों की जापान में हो रही बैठक पर चीन बुरी तरह से भड़का हुआ है। चीन इसे अपनी घेरेबंदी के रूप में देख रहा है और यही वजह है कि चीनी विदेश मंत्री वांग यी क्‍वाड देशों पर तीखा हमला बोला है। वांग यी ने कहा कि क्‍वाड को अमेरिका ने चीन को काबू में करने के लिए बनाया है और उसका विफल होना तय है। वह कभी भी ‘एशियाई नाटो’ नहीं बन सकता है। रक्षा विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी का मानना है कि क्‍वाड इस समय दोराहे पर चल रहा है और उसके पास कोई रणनीतिक लक्ष्‍य नहीं है। उन्‍होंने कहा क‍ि क्‍वाड देशों के नेता जितनी चाहें, बैठकें कर सकते हैं लेकिन बिना एक स्‍पष्‍ट लक्ष्‍य के इसका कोई खास असर नहीं होगा। चेलानी ने कहा कि क्‍वाड का उद्देश्‍य यह है कि वह चीन के विस्‍तारवाद पर लगाम लगाए और हिंद प्रशांत क्षेत्र में शक्ति का संतुलन बनाए रखे।
बाइडन के लगातार उठाए जा रहे कदमों से क्‍वाड को गति मिली
चेलानी ने कहा कि जब क्‍वाड का गठन हुआ था तब कई देशों ने इसकी सफलता पर संदेह किया था। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने तो इसे ‘प्रशांत या हिंद महासागर की फेन’ तक करार दे दिया था। हालांकि जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की दृढ इच्‍छाशक्ति और चीन के लगातार विस्‍तारवाद की वजह से क्‍वाड एक संगठित समूह बनकर उभरा है। हालांकि अभी यह सवाल बना हुआ है कि क्‍या यह अपने उद्देश्‍यों को हासिल कर पाएगा या नहीं। हालांकि एक चीज स्‍पष्‍ट है कि क्‍वाड के सभी चारों देशों ऑस्‍ट्रेलिया, भारत, जापान और अमेरिका को साल 2016 में जापान की ओर से पेश किए मुक्‍त और खुले हिंद- प्रशांत क्षेत्र के महत्‍व का अहसास हो गया है। पहले डोनाल्‍ड ट्रंप और अब जो बाइडन के लगातार उठाए जा रहे कदमों की वजह से क्‍वाड को काफी गति मिली है।

रक्षा विशेषज्ञ कहते हैं कि इसके बाद भी क्‍वाड को अभी काफी लंबा रास्‍ता अख्तियार करना होगा। उन्‍होंने कहा कि यह न केवल उसके सदस्‍यों को लेकर है, बल्कि अपने कदमों को लेकर भी। आज जरूरत चीन को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा के माहौल को खत्‍म करने से रोकने की है। एक प्रमुख समस्‍या यह है कि ये चारों देश चीन की उस दलील में फंस गए हैं जिसके मुताबिक भूराजनीति से आर्थिक रिश्‍तों को अलग रखा जाए। चीन को वैश्विक व्‍यापार से 676.4 अरब डॉलर की कमाई होती है जो उसकी अर्थव्‍यवस्‍था का मुख्‍य इंजन है। इसके बिना चीन की विकास दर गिर जाएगी। वह भी तब जब चीनी राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग निजी कंपनियों पर कड़े पहरे लगा रहे हैं। अगर चीन की विकास दर गिरती है तो वह सेना पर कम खर्च कर पाएगा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आक्रामक अभियान चलाने में पैसा खर्च करने की क्षमता कम हो जाएगी।
भारत और अमेरिका से जमकर कमाई कर रहा है चीन
चेलानी ने कहा कि चीन की व्‍यापार से कमाई में भारत और अमेरिका का योगदान प्रमुख है। अमेरिका का चीन के साथ व्‍यापार घाटा 396.6 अरब डॉलर है जो चीन के कुल व्‍यापार लाभ का 58 फीसदी है। भारत का चीन के साथ व्‍यापार घाटा 77 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यह भारत के कुल रक्षा बजट से भी ज्‍यादा है। वह भी तब जब चीन के साथ भारत का लद्दाख में तनाव बढ़ा हुआ है। दोनों देशों के करीब 1 लाख सैनिक सीमा पर मौजूद हैं। यह भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए खतरे की घंटी है जो चीन के साथ अच्‍छे रिश्‍ते बनाने के इच्‍छुक रहे हैं। उन्‍होंन कहा कि क्‍वाड देशों को आपस में आर्थिक सहयोग बढ़ाना चाहिए। चीन की इस बढ़ती चुनौती और ताइवान पर हमले के बढ़ते खतरे का अब बाइडन को भी अहसास हो गया है।

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