-न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बताया ख़तरा
(फोटो : सीजे नजीर)
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एस अब्दुल नज़ीर की रिटायरमेंट के कुछ हफ़्तों के भीतर आंध्र प्रदेश के राज्यपाल के रूप में नियुक्ति की कांग्रेस सहित विपक्ष ने तीखी आलोचना की है। विपक्ष ने साफ कहा है कि इस तरह की नियुक्तियां “न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ी गिरावट और एक बड़ा खतरा’ हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक सिंघवी ने राज्यसभा में दिवंगत अरुण जेटली की 2013 की टिप्पणी- ‘सेवानिवृत्ति के बाद की नौकरी की इच्छा सेवानिवृत्ति से पहले के फैसलों को प्रभावित करती है। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरा है।’ का जिक्र किया। उन्होंने कहा, ‘हम व्यक्तियों के बारे में बात नहीं कर रहे हैं … सैद्धांतिक रूप से, हम इसका विरोध करते हैं। सीपीएम के राज्यसभा सदस्य एए रहीम ने भी हालिया नियुक्ति पर सवाल उठाया।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) नज़ीर पांच-न्यायाधीशों की पीठ के तीसरे न्यायाधीश हैं, जिन्होंने अयोध्या का फैसला सुनाया था और सरकार से सेवानिवृत्ति के बाद उनको नियुक्ति मिली है। इससे पहले पीठ का नेतृत्व करने वाले भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के सदस्य के रूप में नामित किया गया था। न्यायमूर्ति अशोक भूषण को उनकी सेवानिवृत्ति के चार महीने बाद 2021 में राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।
-भाजपा का पलटवार
भाजपा के मुख्य प्रवक्ता अनिल बलूनी ने आलोचना को खारिज करते हुए कहा, कांग्रेस की हर मुद्दे का राजनीतिकरण करने की आदत है। “पूर्व न्यायाधीशों को अतीत में अनगिनत बार विभिन्न पदों पर नियुक्त किया गया है। हमारा संविधान भी न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्ति के खिलाफ कुछ नहीं कहता है।’
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